निर्मल कुमार – (लेखक अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक, आर्थिक मामलों के जानकार हैं।यह उनके निजी विचार हैं.)

शीर्षक: वक्फ संपत्तियों पर काली छाया: सुधार की अनिवार्यता और वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 की प्रासंगिकता

भारत में वक्फ संपत्तियाँ सदियों से मुस्लिम समाज के आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक सशक्तिकरण का आधार मानी जाती रही हैं। ये संपत्तियाँ गरीबों की सहायता, मदरसों और स्कूलों के संचालन, मस्जिदों की देखरेख, और जनहित के कार्यों के लिए समर्पित थीं। परन्तु समय के साथ इनका उद्देश्य कुचक्रों, भ्रष्टाचार, राजनीतिक मिलीभगत और वक्फ बोर्डों की गैर-जवाबदेही की बलि चढ़ता गया। वक्फ बोर्ड, जिन्हें इन संपत्तियों का जिम्मेदार संरक्षक माना जाता था, कई राज्यों में शोषण, भाई-भतीजावाद और काले लेन-देन के अड्डे बन गए हैं।

काली करतूतों की झलक: राज्यों से उदाहरण
1. कर्नाटक वक्फ घोटाला (2012):
कर्नाटक में वक्फ बोर्ड की 27,000 एकड़ ज़मीन अवैध रूप से बेची गई या नाम मात्र किराए पर दी गई। इस ज़मीन की अनुमानित कीमत ₹2 लाख करोड़ से भी अधिक थी। जांच रिपोर्ट में कहा गया कि बोर्ड के अधिकारियों ने बिल्डरों और राजनेताओं से मिलीभगत कर संपत्तियाँ कौड़ियों के दाम पर हस्तांतरित कर दीं। इसके बावजूद आज तक इस घोटाले में कोई ठोस सजा नहीं हो सकी।
2. महाराष्ट्र में नामी इलाके का पट्टा घोटाला:
मुंबई के पॉश इलाके में वक्फ की एक व्यावसायिक संपत्ति को महज ₹700 प्रति माह के किराए पर पट्टे पर दे दिया गया, जबकि उसकी बाजार दर लाखों रुपये महीने थी। इस “लीज” से होने वाला राजस्व स्थानीय मुस्लिम समुदाय के विकास में कभी नहीं लगा।
3. उत्तर प्रदेश: अतिक्रमण और अपारदर्शी सौदे:
लखनऊ और वाराणसी जैसे शहरों में हजारों वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण है, जिन पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त संगठनों ने होटल, कार्यालय और बाजार बना दिए। बोर्ड ने या तो इन पर कार्रवाई नहीं की या उन्हें औने-पौने दाम पर वैधता दे दी।
4. बिहार: निजी भवनों में तब्दील वक्फ ज़मीनें:
पटना में कई वक्फ संपत्तियाँ तथाकथित ट्रस्टियों द्वारा व्यक्तिगत मकान और कॉम्प्लेक्स में बदल दी गईं, जहां न गरीब रह पाए, न कोई जनसेवा हो सकी। शिकायत करने वालों को धमकियाँ और फर्जी मुकदमे झेलने पड़े।
5. दिल्ली: वक्फ संपत्तियों पर मॉल और बैंक:
राष्ट्रीय राजधानी में कई वक्फ संपत्तियों पर बड़े मॉल, रेस्टोरेंट और निजी बैंकों के दफ्तर बन गए हैं, जिनका लाभ समुदाय को नहीं बल्कि कुछ चहेते व्यक्तियों और एजेंसियों को हुआ।

वक्फ बोर्डों की भूमिका: संरक्षक या सौदागर?

वक्फ बोर्डों की नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव, चयन में राजनीतिक हस्तक्षेप, और आंतरिक लेखा-परीक्षा की कमी ने इन्हें अकर्मण्य और अपारदर्शी बना दिया है। कई राज्य वक्फ बोर्डों में वर्षों से कोई नियमित मीटिंग तक नहीं हुई। जमीनों का रजिस्टर तक अपडेट नहीं होता, और जिन संपत्तियों का रिकॉर्ड है, उनका फिजिकल वेरिफिकेशन नहीं हुआ है। कई मामलों में तो वक्फ बोर्ड के ट्रस्टी ही अतिक्रमणकर्ता निकले हैं।

वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025: सुधार की उम्मीद

इस पृष्ठभूमि में, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 न केवल एक विधायी प्रयास है, बल्कि यह एक नैतिक और सामाजिक सुधार का प्रतीक है। इसमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण प्रावधान हैं:
• संपत्ति को वक्फ घोषित करने से पहले नोटिस और सुनवाई का अधिकार: यह भूमि मालिकों को कानूनी संरक्षण देता है।
• डिजिटाइजेशन और रिकॉर्ड अपडेशन: सभी संपत्तियों को एक डिजिटल पोर्टल पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया जाएगा।
• समयबद्ध न्याय प्रणाली: वक्फ न्यायाधिकरण को 3 माह के भीतर फैसला देना अनिवार्य किया गया है।
• अनिवार्य ऑडिट और लेखा परीक्षण: जिससे आर्थिक लेन-देन में पारदर्शिता आए।
• महिलाओं की भागीदारी: प्रत्येक राज्य वक्फ बोर्ड में कम से कम दो मुस्लिम महिलाओं की नियुक्ति अनिवार्य है।

विरोध किसका और क्यों?

यह स्पष्ट है कि इस विधेयक का विरोध गरीब, बेसहारा, इमाम या अनाथ नहीं कर रहे। विरोध उन लोगों की ओर से है जो दशकों से इन संपत्तियों से गैरकानूनी रूप से लाभान्वित होते आ रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने वक्फ संपत्तियों को अपने निजी व्यवसायों और राजनीतिक संरक्षण का साधन बना लिया है। वे विधेयक को “धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला” बताकर भ्रम फैला रहे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि यह विधेयक आस्था को शोषण से मुक्त कराने का माध्यम है।

निष्कर्ष: भविष्य का रास्ता

वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 हमारे समय की एक आवश्यकता है। यह केवल कानून का सुधार नहीं है, बल्कि न्याय की पुनर्स्थापना का प्रयास है। यह विधेयक सुनिश्चित करता है कि वक्फ संपत्तियाँ अब “बिक्री का साधन” नहीं, बल्कि “सेवा का स्रोत” बनेंगी। अगर सही भावना से लागू किया गया, तो यह मुस्लिम समाज के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक आत्मनिर्भरता के नए द्वार खोल सकता है।

अब समय आ गया है कि व्यापक मुस्लिम समाज, विशेषकर युवा, महिलाएं और प्रबुद्ध नागरिक इस विधेयक के समर्थन में आगे आएं। केवल सशक्त, पारदर्शी और उत्तरदायी वक्फ प्रणाली ही आने वाली पीढ़ियों को न्यायपूर्ण विरासत दे सकती है।

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