रोबिट गुप्ता – छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के कुसमी विकासखंड के एक गांव की ये तस्वीरें शायद आपको चौंका दें। 21वीं सदी में जहां देश डिजिटल इंडिया की ओर बढ़ रहा है, वहीं इस गांव के लोग आज भी ढिबरी और लालटेन की रोशनी में जीवन गुजारने को मजबूर हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं भूताही गांव की, जहां आज तक बिजली नहीं पहुंच पाई है।
भूताही गांव में राष्ट्रपति के दतक पूत्र कहे जाने वाले पंडो जाती के लोग रहते हैं। लेकिन आज भी ये गांव विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है। यहां बच्चों को पढ़ाई के लिए लालटेन की जरूरत पड़ती है, और रात में घरों में सांप-बिच्छू का खतरा बना रहता है। हलाकी भूताहि गांव जंगलों के बीच बसा ये गांव, जिसे घोर नक्सल प्रभावित इलाक़ा कहा जाता है। लेकिन असल मुश्किल यहां नक्सल नहीं, विकास की रोशनी से दूरी है

प्रशासन ने कभी सौर ऊर्जा की व्यवस्था की थी, लेकिन देखरेख के अभाव में अब वो सिस्टम भी कबाड़ बन चुका है। गांव में लगाए गए सोलर पैनल और बैटरियां अब काम नहीं करते सरकार भले ही विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन भूताही गांव जैसे कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।
छत्तीसगढ़ सरकार भले ही विकास की बात कर रही हो, लेकिन भूताहि गांव में आज भी अंधेरा है। बच्चों के सपनों से लेकर बुज़ुर्गों की ज़िंदगी तक सब कुछ ढिबरी और लालटेन के सहारे कब पहुंचेगी यहां विकास की असली रौशनी?”
भूताही गांव की ये तस्वीरें सिस्टम पर सवाल खड़े करती हैं। आखिर कब तक बलरामपुर के ग्रामीण इलाकों को इस अंधेरे से लड़ना पड़ेगा? ये एक बड़ा सवाल है।
