
बगीचा। कल्याण आश्रम कार्यकर्ता प्रवास के दौरान विकासखंड बगीचा के वार्ड क्रमांक 14 में पार्षद एवं कल्याण आश्रम कार्यकर्ता श्री एल.आर. चौहान ने नई पहल करते हुए करम उपवास कर रहीं 50 से अधिक व्रती बहनों को साड़ी भेंट कर सम्मानित किया।
इस अवसर पर करम कहानी, करम की उत्पत्ति एवं करम अखरा के महत्व पर बहनों को मार्गदर्शन दिया गया। कार्यक्रम में कल्याण आश्रम बगीचा से जागेश्वर सिंह,श्रीमती जयमती दीदी, भाजपा जिला महामंत्री मुकेश शर्मा, नगर पंचायत अध्यक्ष प्रभात सीदाम, मंडल महामंत्री पवन सिंह,भारत गुप्ता, जीतू गुप्ता, श्रीमती अनिमा मिंज एवं वार्ड के बैगा तथा अन्य कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
भाजपा के जिला महामंत्री मुकेश शर्मा ने अपने उद्बोधन में बताया कि छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल के जिलों में करमा तिहार आदिवासी समाज के प्रमुख लोकपर्वों में से एक है। यह पर्व मुख्य रूप से भादो मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। हालांकि अलग-अलग गांवों में स्थानीय परंपरा के अनुसार तिथि में अंतर भी देखने को मिलता है।
करमा तिहार का संबंध प्रकृति, कृषि, अच्छे कर्म और भाई-बहन के स्नेह से माना जाता है। इस अवसर पर करमी वृक्ष की डाली को करम देवता के प्रतीक के रूप में स्थापित कर पूजा की जाती है। जशपुर में कृषि और वन पर आधारित जीवनशैली के कारण इस पर्व का प्रकृति और अच्छी फसल की कामना से गहरा संबंध है।
बहनें रखती हैं व्रत, भाइयों की करती हैं मंगलकामना
करमा तिहार के दिन महिलाएं और युवतियां अपने भाइयों की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना के लिए व्रत रखती हैं। शाम को करम डाल की स्थापना कर पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना की जाती है। कई स्थानों पर जवा (अंकुरित अनाज) भी तैयार किए जाते हैं, जो कृषि और उर्वरता से जुड़े प्रतीक माने जाते हैं।
मांदर की थाप पर रातभर होता है करमा नृत्य
पूजा के बाद गांवों में मांदर, झांझ और मोहरी जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर करमा गीत और नृत्य का आयोजन होता है। महिला-पुरुष सामूहिक रूप से करम डाल के चारों ओर नृत्य करते हैं। कई गांवों में यह सिलसिला रातभर चलता है और सुबह करम डाल का विसर्जन किया जाता है।
कर्म और प्रकृति का संदेश
करमा शब्द को ‘कर्म’ और ‘करम’ दोनों से जोड़कर देखा जाता है। लोकमान्यता में अच्छे कर्म करने और जीवन में सुख-समृद्धि आने की कामना के साथ करम देवता की आराधना की जाती है। वहीं करम वृक्ष की पूजा प्रकृति के प्रति आदिवासी समाज की आस्था को भी दर्शाती है।
आदिवासी क्षेत्रों में करमा तिहार इसलिए केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि कृषि जीवन, प्रकृति संरक्षण, सामुदायिक एकता, लोकगीत और लोकनृत्य की जीवंत परंपरा का उत्सव है। करमा नृत्य और गीतों के माध्यम से नई पीढ़ी तक समाज की सांस्कृतिक विरासत भी पहुंचती है।

